चीन की नई शिक्षा नीति (2024–2035): विस्तृत
रिपोर्ट
19 जनवरी 2025 को चीन ने अपना नया शैक्षिक खाका — "2024–2035 मास्टर प्लान: चीन को एक शग्रणी शिक्षा राष्ट्र बनाना" — जारी
किया। यह योजना संयुक्त रूप से CPC केंद्रीय समिति और राज्य परिषद द्वारा
जारी की गई। वर्ष 2025 इस योजना के कार्यान्वयन का पहला पूर्ण वर्ष है। इसका उद्देश्य
एक उच्च-गुणवत्ता, समानता-आधारित और नवाचार-प्रेरित शिक्षा प्रणाली का निर्माण
करना है।
🎯 मुख्य
लक्ष्य (दो चरणों में)
पहला चरण (2027 तक): एक उच्च-गुणवत्ता शिक्षा प्रणाली की स्थापना, जिसमें
प्रतिभाशाली और नवाचारी व्यक्तियों की निरंतर धारा सुनिश्चित हो।
दूसरा चरण (2035 तक): बुनियादी शिक्षा प्रणाली को विश्व के सर्वश्रेष्ठ देशों की
श्रेणी में लाना, और एक ऐसे समाज का निर्माण करना जो आजीवन सीखने पर आधारित हो।
नीति में क्या नया है?
1.मुफ्त प्री-स्कूल शिक्षा
शरद 2025
से सरकारी बालवाड़ियों में नामांकित
बच्चों के लिए एक वर्ष की मुफ्त प्री-स्कूल शिक्षा शुरू
की गई है, साथ ही पात्र निजी संस्थानों को भी सब्सिडी दी जा रही है।
केंद्र और स्थानीय सरकारें मिलकर इसकी लागत वहन कर रहे हैं।
2.AI
और प्रौद्योगिकी केंद्रित पाठ्यक्रम
2024 में चीन ने
1,673 नए स्नातक कार्यक्रम शुरू
किए जो राष्ट्रीय रणनीतियों के लिए जरूरी हैं —
जैसे कि Intelligent
Maritime Equipment, Intelligent Material Technology, Interdisciplinary
Engineering। साथ ही 1,670 पुराने कोर्स
बंद किए गए जो आर्थिक-सामाजिक विकास से
मेल नहीं खाते थे।
3.
उच्च शिक्षा का विस्तार — रणनीतिक
क्षेत्रों में
"Quality-Focused Undergraduate
Expansion" सुधार के तहत शीर्ष विश्वविद्यालयों में प्रवेश बढ़ाया जा रहा
है, विशेष रूप से
Artificial Intelligence, Integrated
Circuits, Biotechnology, New Energy
और Interdisciplinary
Studies में।
4.
विश्वविद्यालयों से उद्योग तक — Technology Transfer
दिसंबर 2025
में विश्वविद्यालय
अनुसंधान के व्यावसायिक हस्तांतरण
के लिए एक राष्ट्रीय ऑनलाइन प्लेटफॉर्म
लॉन्च किया गया, जिससे लैब से बाजार तक वैज्ञानिक परिणाम तेज़ी से पहुंचें।
5.
व्यावसायिक शिक्षा का पुनर्गठन
व्यावसायिक संस्थानों का मूल्यांकन अब
यह देखकर होगा कि वे औद्योगिक विकास और क्षेत्रीय आर्थिक
जरूरतों को कितना पूरा करते हैं। लगभग 80% विशेष कार्यक्रम
रणनीतिक और उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों
से जोड़े गए हैं।
6.
Elite Engineers की
तैयारी
Semiconductors और AI जैसे क्षेत्रों में
उच्च-स्तरीय इंजीनियर तैयार करने के लिए नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, जहाँ
विश्वविद्यालय और कंपनियाँ मिलकर छात्रों की भर्ती,
पाठ्यक्रम डिज़ाइन और शोध करती हैं।
7.
आजीवन सीखने की प्रणाली
AI जैसी उभरती तकनीकों के मद्देनज़र योजना में Open
Universities, Senior Citizen Universities और एक "National
Digital University" की स्थापना का आह्वान किया गया है।
8.
"Education Communities" की
अवधारणा
"Education Communities" की
नई अवधारणा स्कूलों, परिवारों, स्थानीय सरकारों, सामुदायिक
संगठनों और सामाजिक संस्थाओं को एक साथ लाती है ताकि छात्रों का समग्र विकास हो।
9.
Labour Market Data Platform
रोजगार बाजार की मांग और शैक्षणिक
उत्पादन को मिलाने के लिए एक
National Big Data Platform बनाई
जाएगी, जो रोजगार प्रवृत्तियों को ट्रैक कर पाठ्यक्रम समायोजन में मदद
करेगी।
10.
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
योजना में शीर्ष अंतर्राष्ट्रीय
STEM संस्थानों
को चीनी विश्वविद्यालयों के साथ Joint
Programmes चलाने के लिए आमंत्रित करने का प्रावधान भी शामिल है।
बजट
और खर्च : 84 लाख करोड़ रूपया का भरी भरकम बजट
2023 में चीन का कुल शिक्षा व्यय 6.46 ट्रिलियन युआन (लगभग $906
बिलियन अमेरिकी डॉलर) था। नई 2024–2035 योजना में यह सुनिश्चित किया गया है कि सरकारी शिक्षा व्यय GDP
के 4% से
कम न हो। 2025
में भी चीन ने शिक्षा
पर सबसे अधिक सरकारी खर्च
किया —
यह सामाजिक सुरक्षा के साथ शीर्ष पर
रहा। 2022 में चीन ने प्रति छात्र
$5,161 खर्च
किया है, जिसे बढाकर टीन गुना किया जाना है । यह नीति चीन की महत्वाकांक्षा को
दर्शाती है — 2035 तक शिक्षा के क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती देना और तकनीकी
आत्मनिर्भरता हासिल करना।
चीन बनाम भारत की शिक्षा नीति: एक निर्मम आलोचना
"जब दर्पण सच दिखाए तो उसे तोड़ना नहीं, खुद
को सुधारना चाहिए"
पहली और सबसे बुनियादी बात यह है कि
भारत सरकार ने NEP 2020 में खुद वादा किया था कि शिक्षा पर GDP का
6% खर्च किया जाएगा।
लेकिन हकीकत यह है कि 2015 से
लेकर आज तक भारत का शिक्षा व्यय GDP के 2.8%
से 2.9%
के बीच ही अटका हुआ है। यानी सरकार ने
जो वादा किया उसका आधा भी नहीं दिया। दूसरी तरफ चीन का कुल शिक्षा व्यय 2023 में
$906 बिलियन यानी लगभग 84 लाख
करोड़ रुपये था। भारत का पूरा शिक्षा बजट 2025-26
में ₹1.28 करोड़
है। जोड़-घटाव करें तो चीन भारत से
60 गुना अधिक
शिक्षा पर खर्च करता है। और हम
"विश्वगुरु" बनने की फर्जी बात करते हैं —
बिना गुरुदक्षिणा दिए? यह
केवल आर्थिक तुलना नहीं है, यह एक सभ्यताई विफलता का प्रमाण है। जो राष्ट्र अपनी अगली
पीढ़ी में निवेश नहीं करता, वह इतिहास में पिछड़ जाता है —
और यही भारत के साथ धीरे-धीरे हो रहा
है।
दूसरा और शायद सबसे शर्मनाक तथ्य यह है
कि भारत की सरकारी शिक्षा व्यवस्था इतनी जर्जर हो चुकी है कि परिवार उसे छोड़कर
खुद ही अपना बजट बना रहे हैं।
भारत में लगभग 27% छात्र
प्राइवेट कोचिंग लेते हैं — शहरों में 30.7% और गाँवों में 25.5%।
और इन परिवारों के लिए कोचिंग का खर्च उनके कुल निजी शिक्षा व्यय का 43% और
प्रति व्यक्ति घरेलू खर्च का 16.5% है। भारत का कोचिंग उद्योग अभी ₹58,088 करोड़
का है और 2028 तक ₹1,33,995 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। मतलब जितना मोदी की सरकार कुल
खर्च करेगी उतना ही निजी कोचिंग वाले आम नागरिक से एठेंगे............ सोचिए — देश
का कोचिंग उद्योग जल्द ही देश के उच्च शिक्षा बजट से भी बड़ा हो जाएगा। इसका सीधा
मतलब यह है कि सरकारी शिक्षा इतनी नाकाम है कि गरीब से गरीब परिवार भी जेब खाली
करके ट्यूशन भेजने पर मजबूर है। प्राइवेट स्कूल में पढ़ने का खर्च सरकारी स्कूल से
10 गुना अधिक है और परिवार अपनी मासिक आय का 10 से 20% शिक्षा पर खर्च करने को मजबूर हैं। यह "मुफ्त शिक्षा का
अधिकार" नहीं है — यह एक ऐसी व्यवस्था है जो कागज़ पर मुफ्त है और जेब पर बेहद
महँगी। जबकि ये माँ-बाप शिक्षा पर तरह के लगने वाले सेस या उपकार भी देते
हैं..........
तीसरा तथ्य Learning Outcomes का है और यहाँ आँकड़े इतने दर्दनाक हैं कि हर जिम्मेदार नागरिक
को रोना आना चाहिए। ASER 2024 के अनुसार सरकारी स्कूलों में Class
III के केवल 23.4%
बच्चे ही Class II स्तर
का पाठ पढ़ सकते हैं। और World Bank का Learning Poverty Index यह बताता है कि 10 साल
के भारत के 70% बच्चे एक सामान्य पाठ नहीं पढ़ सकते — जो
2019 के 55% से और भी बढ़ गया है। NEP
2020 का सबसे बड़ा वादा था — 2025 तक
हर बच्चे को Foundational Literacy। 2025
आ गया और चला भी गया। तीन में से दो
बच्चे अभी भी निरक्षरता के अँधेरे में हैं। चीन में इस तरह के आँकड़े होते तो CPC की
बैठक में हंगामा मच जाता। भारत में ASER
की रिपोर्ट आती है, दो
दिन चर्चा होती है, और फिर नई योजना का नाम घोषित होता है।
चौथा पहलू शिक्षकों की स्थिति है — जो
किसी भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। भारत
में शिक्षकों के 10 लाख से अधिक पद रिक्त हैं,
खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। उत्तर
प्रदेश और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में अकेले 1-1
लाख से अधिक रिक्तियाँ हैं। OECD के
2025 के आँकड़ों के अनुसार भारत में प्राथमिक शिक्षा में Student-Teacher Ratio 27.2:1 है — यह 43 देशों में सबसे खराब है। उच्च शिक्षा में यह अनुपात 25.7:1 है
जो 37 देशों में चौथा सबसे बुरा है। और इस पर तुर्रा यह कि एक अध्ययन
के अनुसार भारत में लगभग 25% शिक्षक किसी भी दिन अनुपस्थित रहते हैं। चीन ने अपनी नई नीति
में विश्वविद्यालयों और उद्योगों को मिलाकर Elite
Engineers तैयार करने के लिए Joint Recruitment, Joint Curriculum और Joint Research का मॉडल अपनाया है। हम वहाँ खड़े हैं जहाँ हमारे स्कूलों में
शिक्षक हैं ही नहीं — और हम AI Education की बात कर रहे हैं। निजी स्कूलों में शिक्षकों का शोषण का स्तर
आसमान पर जा पहुंचा हैं, स्कूल-कॉलेज-युनिवर्सटी मालोकों के बड़े घर और गाडी और
आरामदायक जीवन के मध्य कोई तुलना नहीं है. मतलब शिक्षक बर्बाद हो चूका है...
पाँचवाँ सवाल PISA का
है — जो भारत के लिए एक खुला घाव है। 2009 में भारत के दो राज्यों —
तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश — ने
PISA परीक्षा दी और केवल किर्गिस्तान से आगे रहे, OECD औसत
से 200 अंक नीचे। इसके बाद भारत ने 2012,
2015 और 2018
में PISA
में भाग ही नहीं लिया। यह दुनिया की
सबसे बड़ी बौद्धिक कायरता है। परीक्षा में फेल हो जाओ तो परीक्षा ही बंद कर दो।
चीन का Shanghai और Beijing PISA में लगातार शीर्ष पर हैं। भारत अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता को
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर परखने से डरता है —
और यह डर ही सबसे बड़ा प्रमाण है कि हम
जानते हैं कि हालात कितने बुरे हैं।
छठा और बेहद महत्वपूर्ण पहलू नवाचार और
पेटेंट का है। 2023 में चीन ने 9,20,797 पेटेंट जारी किए — अमेरिका
के 3,15,245 से लगभग तीन गुना अधिक। भारत ने 2024 में
1,05,157 पेटेंट दर्ज कराए। यानी चीन के पेटेंट की तुलना में भारत का
योगदान नगण्य है। चीन ने December 2025 में अपने विश्वविद्यालयों के शोध को उद्योगों तक पहुँचाने के
लिए एक राष्ट्रीय ऑनलाइन Technology Transfer Platform लॉन्च किया। भारत में IIT और
IISc जैसे संस्थान अच्छे शोध करते हैं, लेकिन
2024-25 के बजट में UGC का आवंटन 61% गिरा
दिया गया। जब आप उच्च शिक्षा की मुख्य नियामक संस्था का बजट आधे से भी कम कर देते
हैं तो यह नहीं पूछना चाहिए कि शोध क्यों नहीं बढ़ता — यह
पूछना चाहिए कि यह जानबूझकर किया जा रहा है या अनजाने में।
सातवाँ और सबसे गहरा घाव वह सामाजिक
असमानता है जो भारत की शिक्षा व्यवस्था ने पैदा की है। भारत
में 70% सरकारी स्कूल हैं जो 50%
बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन
अमीर परिवार प्राइवेट स्कूलों की तरफ भाग रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च
माध्यमिक स्तर पर सरकारी स्कूलों में नामांकन 2017-18
के 68%
से घटकर 2025
में 58.9%
हो गया है। यानी जो लोग सरकारी स्कूल
छोड़ सकते हैं वो छोड़ रहे हैं। जो नहीं छोड़ सकते —
गरीब,
दलित,
आदिवासी,
ग्रामीण —
वो एक ऐसी व्यवस्था में फँसे हैं जिसे
खुद सरकार ने उपेक्षित कर दिया है। निजी स्कूल के एक छात्र पर सालाना ₹28,693 खर्च
होता है, सरकारी स्कूल के छात्र पर मात्र ₹2,863।
यह 10 गुना का अंतर केवल पैसों का नहीं है — यह
अवसरों का, सपनों का और भविष्य का अंतर है। NEP 2020 "समता
और समानता" की बात करता है — लेकिन जमीन पर शिक्षा की खाई और गहरी
होती जा रही है।
आठवीं और अंतिम बात — नीति
बनाम क्रियान्वयन का वह पुराना भारतीय रोग। भारत
सरकार की अपनी वेबसाइट स्वीकार करती है कि NEP
2020 "2030-40 के
दशक में पूरी तरह क्रियान्वित होगा।" चीन ने अपनी जनवरी 2025 की
नीति के कार्यान्वयन के लिए उसी वर्ष अप्रैल से जुलाई के बीच 31 प्रांतों
और 130 से अधिक विश्वविद्यालयों के साथ 7 क्षेत्रीय
बैठकें कर 2025-27 का ठोस Action
Agenda तैयार कर लिया। भारत में नीति 2020 में
बनी, 2025 में भी ढंग से लागू नहीं हुई,
और सरकार कह रही है 2040 तक
हो जाएगी। बीस साल। एक पूरी पीढ़ी की उम्र। जो बच्चा 2020 में
पैदा हुआ वो 2040 में 20 साल का होगा — और उसकी पूरी शिक्षा उस नीति के "Operational Mode" से पहले ही पूरी हो जाएगी। यह नीति नहीं — यह
भावी पीढ़ियों के साथ एक ऐतिहासिक धोखा है।
चीन की नीति में लोकतंत्र नहीं है, लेकिन
इरादा, पैसा और क्रियान्वयन है। भारत की नीति में सुंदर शब्द हैं, बड़े
सपने हैं, लेकिन न पर्याप्त बजट है,
न समयबद्ध क्रियान्वयन है, न
जवाबदेही है। और सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इस सबकी कीमत वो बच्चे चुका रहे हैं
जिनके पास न कोचिंग का पैसा है, न प्राइवेट स्कूल का विकल्प — केवल
एक टूटे हुए सिस्टम का भरोसा है जो बार-बार टूटता जा रहा है।
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